था

था

एक दरख्त

बेज़ार, बेज़ान, जर्जर

बामुश्किल

साधे खड़ा था

खुद को ।

था

एक अहसास

अपने होने का

मगर

वक़्‍त की आँधी में

अब

वो निशां भी गया ।

 

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