पिता

बाप मेरा

बरगद तो नहीं

पेड़ ज़रूर है

एक पेड़

जो

वैसे तो

अब चुका पड़ा है

बामुश्किल लेटा सा खड़ा है

किनारे पर

निरीह,निपात,नीरस,

किन्तु

अब भी

जब भी

कोई किरच धूप की

छीलती है मेरा बदन

वो

फैला देता है

सूखी शाखें

छुपा लेता है- खोखर में

अपने बदन की छाल

मलता है – मर्हम  सी

मेरे घावों पर

दुआओं के साथ

मेरा पिता ।

 

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