मैं दासी अभीभूत हुई ।

गुरू संईया ने पग छंईया

जो कृपा कर अपनाया

मैं दासी अभीभूत हुई ।

 

अकूत कूप का पावस पानी

निस दिन मुझे पिलाया

मैं प्यासी अभीभूत हुई

मैं दासी अभीभूत हुई ।

 

सत्‌-सूरज पावन प्रकाश से

घट में किया उजियारा

मैं तामसी अभीभूत हुई ।

मैं दासी अभीभूत हुई ।

 

शब्द-ब्रह्म का अनहद नाद

हर पल हृदय किया गुंजार

मैं उदासी अभीभूत हुई ।

मैं दासी अभीभूत हुई ।

 

काल बली की फाँस छुड़ाकर

दी आवागमन-मुक्ति आस

मैं निरासी अभीभूत हुई ।

मैं दासी अभीभूत हुई ।

 

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