मैं अब भी इसकी दीवार

मैंने ही सिरजा,सहेजा,संभाला

इसे, नींव से नियम तक

मेरे रक्त ने ही रंगी

इसकी बुलंदी सुर्ख-चटक

जो, हृदय-हरितिमा-हुलसित

परिश्रम-प्रीत, पीत-पुष्प-पल्ल्वित

केसरिया हो गई

पाग पयोद हो गई ।

रहा सतत शांत-सगा

मैं सफेद-स्याह का

इसके गति-चक्र की

आह-वाह, राह का

जैसे-जैसे चक्र चला

स्वार्थ पला, कुचक्र फला

अटारी सजी, गुंबद तने

अयाने द्वारपाल, सयाने मकीं बने

गर्भगृह-शिखर के अय्यार

अकर्मण्य, विलासी ! फिर भी सरकार

मेरे दिल-देह पर सवार

पेट, पीठ पर अत्याचार

पर ! मैं – अब भी इसकी दीवार

उत्सर्ग को तैयार,उत्सर्ग को तैयार

 

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