असल में

कुरूप तो कोसते रहे केवल

कभी जन्म को, कभी जमाने को

असल में –

आईना तो

कलमुँहों ने तोड़ा है ।

मदिर मस्ज़िद तो बहाने हैं  उनके

कभी बनवाते हैं, कभी तुड़्वाते हैं

असल में –

सहज इंसानियत का

मज़हब ही तो रोड़ा है ।

युद्ध और योद्धा तो निमित्त रहे सदा

कभी लड़े गए, कभी लड़वाए गए

असल में –

राम राज्यों को तो

कुटिलों ने ही झिंझोड़ा है ।

लोकतंत्र तो तज़वीज है मात्र

स्वार्थ का मेल, वोट का खेल

असल में –    

सयानों ने ही

सियासत को निचोड़ा है ।

जितना भी ऊपरी है, दिखावा है

उतना ही भरभराकर गिरता है

असल में

बुनियादों ने ही

ज़लज़लों का रुख मोड़ा है ।

पंख उड़ान नहीं, ज़रिया है

आकार प्रकार भी मिथ्या है

असल में

हौसलों ने ही

परिन्दों को परवाज़ से जोड़ा है ।

 

अब तो करना ही है, कुछ करें

आओ दिल मिलाएँ, कदम बढाएँ

असल में –

असंभव को तो

इच्छा शक्ति ने ही तोड़ा है ।

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