रीत

राक्षकों से  रक्षा हेतु

पुरखे भी करते रहे-

मात्र आस/आराधना अवतार की

और

रहे विलासरत

अब

बन गई – रीत !

स्व आहुति तज

बन परावलंबी / आत्म विमुख

बठे हैं –

इन्तजार में

किसी परचम तले

अगुआ- अनुरुप टेरने-

जिन्दाबाद-मुरदाबाद

जिन्दाबाद-मुरदाबाद ।

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