फ़सलें

दाने तो इच्छा के बोए थे
ज़हरीली फ़सलें क्यों उग आईं

पढ़े-लिखे लोगों ने सोचा था
ख़ुशहाली इस रस्ते आएगी
नई रोशनी में यह साफ़ दिखा
सब कुछ मशीने खा जाएँगी

जब कोई भी नहीं बचेगा तो
विस्फोटक नीति क्यों बनाई ।

देश बेचकर खाने वाले
नेता बनकर आगे आए
नौटंकीबाज़ कुछ मदारी
सेवा का ईनाम पाए

पेशेवर भुक्खड़ जननायक है
सत्ता की रबड़ी मलाई ।

भोगवाद की अंधी खाई
सुख और सुविधा के दल-दल
लाइलाज कई महामारी
बरसे फिर प्रगतिशील बादल

मन की गुलामी में जकड़ी है
कैसे विज्ञान की रूलाई ।

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