ये सौन्दर्य नहीं चाहिये——

तेरे होंठ——
खिलते हु, गुलाब की दो पंखुरिया
तेरे नयन—–
हटते औ छाते बादलों मे ज्यों चाँद
तेरी बिंदिया—-
चंदा के समीप ला द्य्रुवतारा
तेरी चूडिया—–
पनद्यट पर पानी भरती तारों की टकराहट
तेरी मेंहदी—–
आसमां के सीने पर सितारो से लिखा कोई नाम
तेरा काजल—-
स्याह रातों का आमन
तेरी पायल—
रातों का मौन तोडती चंचल हवा
तेरे नाखून—
सार से निकले सीपो का श्रृंगार
तेरे खुले के—-
सार की इठलाती लहरो का बांकपन
औ तेरी मदमाती चाल—-
जल में स्वछन्द द्यूमती मासूम हिरनी
और सचमुच तुम इतनी ही खुबसूरत हो
तो——-
तो मैं तुम्हें प्यार नही करू—-
क्यो कि—-
तुम फिर मानवीय कृति नही हो सकती
तुम तो ,क मूरत हो—
स्वर् की—-
फिर मैं तुम्हें

कि प्यार का मंदिर बनवाकर
उसमे तुम्हारे रूप को रखकर
पूजा करू —-इतना रूप
प्यार के लिये हो ही नही सकता।
ये तो फिर—–
श्रंगार का प्रतीक है
पूजा का प्रतीक है।
तुम मेरी प्रेयसी हो ही नही सकती
इस सौंदर्य को और मैंने प्यार किया तो
मेरा प्यार लूट लिया जाय
फिर मैं इसकी क्यो न पूजा करू
ताकि ये श्रंगार बन सबके लिये
पूजनीय हो और मै—–
तेरे इस पूजनीय रूप को प्यार करू
तेरे इस रूप को प्यार करू।

वंदना मोदी  गोयल

 

 

 

 

 

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  1. राजेश चोहान 27/08/2013

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