बरबस ही मेरे आँखो

बरबस ही मेरे आँखो से  फिर बरसात हो गई
भुलना चाहा बहोत मगर फिर से याद हो गई
फूल भी तो खिलती है काँटो ही के साथ साथ
क्या थी मेरी भुल जो जिन्दगी बरबाद हो गई
दिया नही मौका मुझे भी हकिकत बतानेको
फुट फुट रोने लगी वह और जजबात हो गई
मेरी मुहब्बत पाक थी सम्झी नही उन्होने कभी
बे बजह ही दर्द की एक लम्बी सुरुवात हो गई
वो तो बस अतीत थी इफ्तिफाक से मिली डगर पे
इनकी उम्मिद टुट गई जब उनसे  मुलाकात हो गई
हरि पौडेल

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