शेर

गम तो गम ही मुकद्दर और तकदीर नहीं |
हम तो हम ही है कोई रास्ते के फ़क़ीर नहीं ||

जुगुनू वहाँ नहीं चमकता जहाँ सूरज का उजाला है |
डूबती वो नहीं किस्ती जिसे तूफां ने संभाला है ||

खिलाडी तो खिलाडी है वो सब हारे या सब जीते |
अनाड़ी खेल से भागे वो क्या हरे औ क्या जीते ||

हमने बहाए आंशू वो समझे बरसात हो रही है |
रो रो के थक गए हम वो बोले बरसात रुक गई है ||

मै किसी को जख्म देता नहीं बस अपना जख्म दिखता हूँ |
गर जख्म दिखा दे कोई मुझे तो मरहम भी बन जाता हूँ ||

उजड़े हुए गुलशन में भी हम गुल खिलाते है |
गैरों से तो वफ़ा हि मिली हमें अपने ही सताते है ||

मेरा वजूद मिटा सके वो दम ज़माने में नहीं |
मुझे नशा चढ़ा सके ऐसी शराब शराबखाने में नहीं ||

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