तन्वादि संज्ञा

तनु

लग्न मूर्ति तनु उदय वपु आद्य कल्प अंग जानु |
द्वादश संज्ञा लग्न की भली भांति पहिचानु ||

धन

स्व कोष अर्थ कुटुम्ब धन ये पंचम धन भाव |
ज्योतिष का सम्मान कर इष्ट देव को ध्याव ||

भ्राता

सहज भ्रात्र दुश्चिक्य बखाना |भ्रात्र भाव संज्ञा संज्ञाना ||

सुह्रद

अम्बा तूर्य हिबुक पाताला |सुह्रद यान वाहन गृह शाला ||
अम्बु नीर जल वाहन अहंहीं |द्वादश संज्ञा सुह्रद की कहहीं ||

पुत्र

तनय तनुज विद्या बुधि आत्मज |वाक् पुत्र को पंचम कह द्विज ||

रिपु

रिपु द्वेषी वैरी क्षत कहहीं |चारिउ संज्ञा षष्ठ की अहहीं ||

स्त्री

स्त्री स्मर काम मदन मद |द्यून अस्त जामित्र सप्त वद ||

म्रत्यु

लयपद याम्य छिद्र अरु रंद्रा |आयु निधन कह कोविद वृंदा ||

धर्म

गुरु तप मार्ग धर्म शुभ माना |पंचम भाव नवम के जाना ||

कर्म

मेषुरण आज्ञास्पद कर्म मान व्यापार |
व्योम नभस गगन मध्य तात दशम व्यवहार ||

आय

आगम प्राप्ति आय त्रय भावा |एकादश की संज्ञा गावा ||
अंतिम प्रान्त्य रिश्फ़ ब्यय जानौ द्वादश भाव की संज्ञा मानौ ||

अन्य संज्ञाए

प्रथम दशम चतुर्थ अरु सप्प्तम |मानहिं ज्योतिष कोविद केंद्र सम ||
चतुष्टय कंटक केंद्र हि मानौ |पंचम नवम त्रिकोण बखानौ ||
दूसर पंचम अष्टम जाना | एकादश को पणफर माना ||
द्वादश तीसर षष्ठ नवम | ज्योतिष संज्ञा है आपोक्लिम ||

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