रणचंडी

सन 71 ओर कारगिल का,
संग्राम याद करा देंगे I
भारत माँ की धरती का,
हम क्षेत्रफल बढ़ा देंगे II
अब की बार जो युद्ध हुआ,
तो नक्शा नया बना देंगे I
पाकिस्तान न होगा उसमें,
नामों निशां मिटा देंगे II

कीमत ही लगाते रहना,
सीमा पर खड़े जवानों की I
कुछ तो शर्म करो नेताओं,
आजादी के दीवानों की I
भाषा तो सिखलानी होगी,
उनको अब इंसानों की I
सिंह गर्जना करो मनमोहन,
बात करो मर्दानो की II

“शरीफ” हो या “सिंह” कोई अब,
ऐसी – तैसी सबके बहानों की I
ईट से ईट बजा देंगे हम,
पाकिस्तानी हुक्मरानों की I
मातृ भूमि पर चढ़ गए जो,
कसम है उन बलिदानों की I
“रणचंडी” बन हम उतरेंगे,
खैर नहीं अब शैतानों की II

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ग्रुरचरन मेह्ता 

One Response

  1. ASEET YADAV 13/08/2013

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