कर गुनाह कबुल

आंसू मिलेंगे जीवन की राहों में I
छल मिलेगा अपनों की बाहों में II

जिनकी चाहत में खोये रहे हम,
नफरत मिलेगी उनकी निगाहों में I

वो खुदा ही संभालेगा अब तो हमें,
जाकर देखेंगे अब उसकी पनाहों में I

सजा के हकदार तो हम भी हैं,
शामिल रहें हैं उनके गुनाहों में I

डूबना पड़ेगा उन्हें भी अश्कों में,
आंसू बहायें हैं हमने भी आँहों में I

नवाबों से शौक जो पाले न होते,
गिनती होती हमारी भी शाहों में I

धोखे की पट्टी बंधी थी आँखों पर,
तलाशते रहे बहार हम फिजाओं में I

मौक़ा है कर गुनाह कबुल अपने “चरन”
वर्ना पड़ेंगे कौड़े सरे आम चौराहों में II

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गुरचरन मेह्ता 

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  1. Muskaan 14/08/2013

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