मेरे भीतर की स्त्री

मेरे भीतर एक स्त्री रहती है जो

पढ़ लेती है आँखों की भाषा ,
नोच लेती है मेरा आवरण और ,
गिन लेती है चेहरे पर उदासी की सभी रेखाएं ,
चुन लेती है स्मित की पंखुरिया ,
मेरे जिस्म पर  हर कही ,
चिपकी रहती है उसकी आँखें,
बरजती रहती है,गलत सा कुछ दिखते  ही ,
वो मुझे भीड़ से निकाल  ले आती है और थामे रहती है ,
तन्हाई में मेरी बाहें ,
कभी-कभी मेरे दिल में दुबके हुए ,
नन्हे बच्चे को भी जगा देती है वो और ,
खुश हो जाती है,
कितनी अच्छी है सचमुच,
मेरे भीतर की स्त्री .

4 Comments

  1. minoo bhagia 10/08/2013
    • prem narain premnarain 23/08/2013
  2. gautam jain 11/08/2013
    • prem narain premnarain 23/08/2013

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