“हमने तो जीवन में केवल ….”

हमने तो जीवन में केवल, मानवता का पाठ पढ़ा है।

मानवता ही मेरी मंजिल, बस उसका ही नशा चढा है।।

 

मानवीय मूल्यों का अब तक, कदम कदम पर हुआ क्षरण है।

मानवता के दिव्य नगर में, दानवता का पढ़ा चरण है।।

चरित्रहीनता तांडव करती, लगी दांव पर इज्जत सारी।

बगुलाभगत भेडियों से हैं, भयाक्रांत बच्चे नर नारी।।

 

हर निराश मानव के अन्तस, नई चेतना जोश बढा  है।

हमने तो जीवन में केवल, मानवता का पाठ पढ़ा है।।

 

संवेदनहीन भावना अक्सर, अब लोगों में जाग चुकी है।

मानवता प्रति सच्ची सेवा, दिल से उनके भाग चुकी है।।

गोरा रूप सभ्यता का पर, अब अतिशय बदचलन हुआ है।

ऐसी घोर बनावट से तो, मर्यादा का हनन हुआ है।।

 

निर्दोषों पर सदा दोषियों, ने नित नूतन झूठ मढ़ा है।

हमने तो जीवन में केवल, मानवता का पाठ पढ़ा है।।

 

वर्ग विहीन व्यवस्था से ही जीवन में, खुशियाँ आयेंगी।

शोषण मुक्त समाज बने तो, वे जन गण  मन को भायेंगी।।

युगों युगों से होता गुंजित, धरा गगन में भारत नारा।

हम यही सदा कहते आये, सम्पूर्ण विश्व परिवार हमारा।।

 

विश्व कुटुंब के खातिर हमने, पहले से इतिहास गढा  है।

हमने तो जीवन में केवल, मानवता का पाठ पढ़ा है।।

 

-मनमोहन बाराकोटी ‘तमाचा लखनवी’,

 

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