फुरसत मिले कभी तो

फुरसत मिले कभी तो जरा सोचिये हुजूर ,
कहाँ ले जा रहे है हमे कुछ बोलिए हुजूर .

कभी के पक गए हमारे पाँव के छाले ,
बाँधी है जो पट्टी उसे अब खोलिए हुजूर .

हम चैन से जी रहे है उनको यकीन नहीं है ,
फिजाओं में ज़हर मत घोलिये हुजूर .

कुछ भी बोल देते है ये फितरत है आप की ,
बोलने से पहले उसे तौलिये हुजूर.

कुछ कर नहीं सकते तो रहने ही दीजिये,
जख्मों को इस तरह मत टटोलिये हुजूर.

2 Comments

  1. शुभम् श्रीवास्तव 'ओम' शुभम् श्रीवास्तव 'ओम' 05/08/2013
    • prem narain premnarain 23/08/2013

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