शहीद श्रद्दांजलि

ये देश प्रेम का गीत सुनो ,कोई झूठा अनुराग नही |
यह अमर शहीदों की गाथा ,है कोई फर्जी राग नही ||
हम कथा सुनाते है उनकी जिनके दामन में दाग नही |
खेली होली थी  लोहू से था  फागुन का वो फाग नही ||

राणा प्रताप की कथा सुनों ,जो रोटी खाये घासो की |
मिट गए मगर रक्षा कर दी हल्दी घाटी के घाटों की ||
धन धन्य हुआ था भामा का पूरण कर सैन्य सपाटों की ||
राणा प्रताप के तीरों से मिटी हस्ती मुगली ठाठों की ||

मंगल पांडे का युद्व घोष सन सत्तावन का उदघोष बना |
मिल नही सकी थी विजय मगर भारत माँ का आक्रोश बना ||
था वीर बहादुर शाह जफ़र कटे शीश सुतों का रोष बना |
मर गया वीर रंगून में था  पर भारत का  संतोष  बना  ||

रानी लक्ष्मी का घोर युद्ध अगंरेजो को दहलाया था |
दो हाथों की तलवारों ने रण कौशल खूब दिखाया था ||
नानासाहब ने जी भरकर गोरों को खूब छकाया था |
टीपू जैसे  सुल्तानों ने तो  ,काल रूप दिखलाया था ||

वो आजाद चंद्रशेखर जी थे जो गोली खूब चलाते थे |
कोंडों की मारों में भी जो आजादी गीत सुनाते थे ||
मर गये जो खुद की गोली से वे गुल गोली से खिलाते थे |
काली करतूतों वाले उन गोरों का खून बहाते थे ||

था भगत सिंह भी एक वीर जो सरेआम बम फेंक दिया |
बर्फ शिला पर  भी जिसने था  देश प्रेम घनघोर दिया ||
फांसी के तख्ते पर भी जिसने इन्कलाब पर जोर दिया |
फंदा फांसी का लगा भले भारत का फंदा खोल दिया |

नेता सुभाष का क्या कहना जो नेता बना विश्व भर का |
हिटलर हों या फिर मुसोलिनी वो ताज बना सबके सर का ||
कर कैद लिया था गोरों ने पर नटवर बनकर वो सरका |
आजाद हिन्द की रचना कर दे दिया ताज भारत सर का ||

लाल बाल औ पाल गरम दल के नेता कहलाये हैं |
देश प्रेम  का भाषण  दे डंडे  सर    पर चलवाये हैं ||
विस्मिल हरदयाल जैसे फांसी को चूम के गाये हैं |
जाने कितने ऐसे सपूत इस देश में पहले आयें हैं ||

गांधीं नेहरु लोहिया के देश में  जाने अब क्या बदल गया |
तीनों लालों का देश प्रेम इस देश क्यूँ अब निकल गया ||
दी आजादी है शहीदों ने क्यूँ आज का नेता फिसल गया |
रक्षा करके  आजादी की   आजादी को हि निगल गया ||

रोजी रोटी तो हक अपना उनकी क्या ये मजबूरी है ?
करने वालों को काम नहीं  जो करते ही मजदूरी हैं |
इस  देश  शाहंशाहों  की  हर  शाम बनीं  अंगूरी है ||
प्रार्थना हुई है अब तक तो अब तो रण बहुत जरूरी है ||

करते वे काम सभी ऐसे जो योग्य न आगे बढ़ पायें |
दिन रात जाग कर जो पढ़ते उनको रोजी न मिल जाये||
अन्ना हों या हों रामदेव सपने न किसी के फल पायें |
ये शाशन  है या  दुष्शासन  द्रोपदी चीर को हर लाये ||

कर चुके बहुत अनशन अन्ना ये कंश दशानन राजा हैं |
मर जायें भले अब योग गुरु ये शर्म बिना बिन लाजा हैं ||
ये  शठ  हैं शठता से  मानें  उपदेश  यही अब  ताजा है |
तू शीघ्र छोड़ अब गद्दी को नर इन्द्र  बना अब राजा है  ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
09412224548
9582510029

2 Comments

  1. shailesh singh 17/08/2013