स्वर्ण तपकर बनता कुन्दन

स्वर्ण तपकर बनता कुन्दन

राजस्थान की धरा पर, हम महिमा भारत की गाते हैं

जब तक है जान डटे रहेंगे, मिलकर कदम बढाते हैं

स्मरण है हमें सदा, राष्ट्र गौरव स्वाभिमान

थाती संजोए रखी है, रखा है देश-धर्म का मान

नहीं डरते हैं कभी, हालातों के झंझावातों से

पुरस्कार की चाह नहीं, चलते अटल इरादों से

लिया है प्रण सेवा का, इसे अनवरत निभाते जाएंगे

सत्यमेव जयते के मूलमंत्र को, कभी ना भुलाएंगे

प्रतिग्या अपनी ‘सेवार्थ कटिबध्दता’ से पूर्ण करते हैं

शिक्षा यही आमजन में विश्वास, अपराधियों में डर भरते हैं

क्षण-क्षण अपना रचता जाए, मानवता की कहानी

णमोकार औंकार अजान, सुनते प्रेयर और गुरुवानी

केंपस यह एक भट्टी है, स्वर्ण तपकर बनता कुन्दन

द्रव्य हमारा लक्ष्य नहीं, करते नित मात् भूमि का वन्दन

जोश और जुनून से यहां, तैयार होते फौलाद

धरती धोरों की यह, बनाती रक्षा की बुनियाद

पुरातन आडम्बर  छोडकर, पकडी है आधुनिक राह

रहें सभी सुरक्षित, यही है अपनी चाह

“गोपी”

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  1. Ram Gopal Sankhla Ram Gopal Sankhla 30/07/2013

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