प्रिय अगर मै रूठ जाऊं

प्रिय अगर मै रूठ जाऊं,
प्यार से मुझको मनाना |
जो कभी भटकूँ दिशा से,
रास्ता मुझको दिखाना ||

रात कितनी भी बड़ी हो,
चेतना मद्धिम पड़ी हो |
जगमगाते-झिलमिलाते,
नेह के दीपक जलाना ||१||

आज मन के तार बोलें,
ये प्रणय के द्वार खोलें |
हृदय है आवास प्रियतम,
प्रीत से इसको सजाना ||२||

–दीपक श्रीवास्तव

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