शायरी

इन्तेहाँ की कोई भी हद नहीं होती,
बेबसी की कोई भी ज़द नहीं होती,
इश्क की जो राह में दिलबर पे फ़ना हो जाते हैं,
उनकी बेखुदी से बढ़कर कोई लत नहीं होती.
                    :-सुहानता ‘शिकन’

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