कुछ मुक्तक (II)

———————————————————————-
दुश्मन जो हमको समझते हैं उनकी यारी नहीं है किसी से
शिकवें सुला दें, गम को भुला दें, फेंकें इन्हें जिन्दगी से
जीवन का अर्थ यही हमने जाना जलें क्यूँ किसी की हंसी से
आओ मिलकर कर्रें दिल की बातें जी लें ये दो पल ख़ुशी से
——————————————————————————
अपनों को चुन लो, सपनो को बुन लो, कोशिश जरा करके देखो
अपने लिए तो जीते सभी हैं उनके लिए मर के देखो
किसी पर तो तुमको करना पडेगा यकीं तो जरा करके देखो
छाया नज़र आये तुमको, हथेली में बुँदे ज़रा भर के देखो
—————————————————————————
दिल से जो चाहो तुम हाँ किसी को तो वादा भी दिल से निभाना
किस्से पुराने भुला कर सभी के तुम बस, बस मुस्कुराना
सीख ली हैं तुमने ये बातें , तो तुम भी किसी को सिखाना
भरोसा जो टूटे अब हाँ किसी का , उसको भरोसा दिलाना
————————————————————————
आगे बढ़ना तू तो हमेशा काम नहीं तेरा रुकना
आंसुओ से अदा कर ही चुके, कर्जा था जिनका चुकना
शान से जीना शान से मरना, कभी भी अब ना सिसकना
मुट्ठी में दुनिया को कर लेना ईक दिन, आगे किसी के ना झुकना
———————————————————————————–
लोगों का क्या है लोग तो तुमको पागल ही समझेंगे
जाने वालो को याद करोगे तो आंसू ही निकलेंगे
सपने तो सपने है, पुरे भी होंगे, टूटेंगे बिखरेंगे
सहना है सब कुछ हमको यहाँ पर, तभी तो हम निखरेंगे
———————————————————————-
उठ का गिरेंगे, गिर कर उठेंगे, तभी तो हम संभलेंगे
ठोकर लगी है फिसल कर हमें तो अब नहीं फिसलेंगे
रो-रो कर अब कब तक गुजारें कभी तो हम हंस-लेंगे
धोखा दिया जिसने भी हमको, हाथो को वे मसलेंगे
——————————————————————
जुगनुओं का इशारा, आसमां में सितारा, सदा ही चमकता रहेगा
टुटा है दिल तो फिर क्या हुआ, ये सदा ही धडकता रहेगा
गुलाब तो बागों के कांटो में भी, सदा ही महकता रहेगा
सुबह का सूरज उजाला फैलाये सदा ही चहकता रहेगा
———————————————————————–
ख़ुशी के पलों को संजोना सदा ही, गम को किनारे लगाना
चहरे पे चेहरा चढ़ाये हुए, फांसला तुम उनसे बनाना
अच्छी लगें बातें मेरी तो, खुद को जरा तुम समझाना
दिल जो दुखाया हो तुमने किसी का तो माफी तुम मांग आना
—————————————————————————
झूठी दुशाला ओढ़े हुए जो उनको उजागर करूंगी
समझे जो समझे टूटी हुई हंडिया खुद को मैं गागर करूंगी
जीती रहूंगी मैं अपनों की खातिर अब न किसी से डरूँगी
अभी तो मैं हूँ ईक छोटी सी नदिया, खुद को मैं सागर करूंगी
————————————————————————-
कितनी कठिन हो सफलता की राह ऊपर तो अब मैं चढूंगी
कदम जो बढ़ाया है तो पीछे नहीं हटना आगे ही आगे बढूंगी
चाहे न चाहे दुनिया में कोई मैं खुद की ही मूरत गडूंगी
मंजिल को अपनी पाना है मुझको मैं सारे जहाँ से लडूंगी
_____________________________________________
गुरचरन मेहता

One Response

  1. Muskaan 23/07/2013

Leave a Reply