तब कविता बनती है

माँ शारदे को नमन कर, चमन को अमन कर
अपनों को गले लगा – शत्रुओं का दमन कर
सभी के हित के लिए जब कवि की कलम उठती है
तब कविता बनती है, तब कविता बनती है

दर्पण को फोड़कर , आँधियों का रुख मोड़कर
अभिमान को तोड़कर , स्वाभिमान को झंझोड़ कर
वास्तविकता को सहकर, आंसुओं में बहकर
स्वपन सारे ढहकर, वर्तमान में रहकर
मन को लपेट कर, शब्दों को समेट कर
जब प्रेम भावना पनपती है
तब कविता बनती है

दिल के मरुस्थल पर, शब्दों के धरातल पर
ज़रा नजाकत से, सच्चाई की ताकत से,
जिन्दगी को भूलकर, पुरी तरह मग्न होकर
चिरागों की रौशनी में, लिखने से पहले सोचकर
आस्थायों को घोलकर, अच्छे से नाप- तोलकर
विचारधीन रहकर बात मन की छलनी से छनती है
तब कविता बनती है

संवेदनाओं के समंदर में , मन के अन्दर में
गहराई को छूकर, पराकाष्ठा को महसूस कर
अर्थक पर्यासों से, टूटती साँसों से
ख़ुशी के क्षणों को से भागकर, इच्छाएं त्याग कर
एहसासों को ठोस कर, मन को मसोस कर
अपनी ही गूंज से पायल जब छनकती है
तब कविता बनती है

बातें सभी की सुनकर, सपनों को बुनकर,
लेटते बैठते, खाते पीते, तो कभी सोते सोते
चलते चलते, हँसते हँसते, तो कभी रोते रोते
कभी राजनीति में धंसकर, चंगुल में फंसकर
शहरों में गाँव में, कभी पीपल की छाँव में
गोरी की चूड़ी जब खन-खन खनकती है
तब कविता बनती है

सावन के महीने में, बूंदों की फुहार में
जख्मों को ले सीने में , कभी रस की धार में
अपनों की दगाबाजी तो कभी गैरों के प्यार में
कभी जीत की ख़ुशी में , कभी गम की हार में
जिससे कभी मिले ही नहीं, उसके इंतज़ार में
कच्चे धागों की डोरी जब टूट कर बिखरती है
तब कविता बनती है

खुशुबू से महक कर, अंगारों से दहक कर
कभी गलत कभी सही, कभी कही, कभी अनकही
कभी चाहकर, कभी निभाकर, रूठकर तो कभी मनाकर
कभी मुद्दों को उठाकर, कभी सच को सुनाकर
शब्दों का गुजरना होता है, जीना मरना होता है
सोचते सोचते जब दिल की धड़कन बढ़ती है
तब कविता बनती है,

जब दहेज़ के लोभियों द्वारा बहु को ज़िंदा जलाया जाता है
जब अपनी ही बेटी को पैदा होने से पहले मरवाया जाता है
जब किसी की माँ-बहन-बेटी, रहनुमाओं को खिलोने लगने लगते हैं
जब ऊँचे ऊँचे विचारों वाले व्यक्तित्व, अचानक बौने लगने लगते हैं
जब किसी बंधन में बंधकर किसी मा बाप की बेटी सिसकती है
तब कविता बनती है

मक्कारों की भरमार से, शिकारियों के शिकार से
लडते हुए गद्दार से , ज़मीर के धिक्कार से,
नेताओं के भ्रष्टाचार से , दुशाशन के दुराचार से ,
द्रौपदी के त्रास से, जानकी के बनवास से,
दामिनी की चीत्कार से, ओर सभी के हा-हाकार से
जनता पीड़ित होकर जब आह भरती  है
तब कविता बनती है

जब जलियावाला बाग़ में खून की होली खेली जाती है
जब सजा के तोर पर काला पानी की सजा झेली जाती है
जब जब आजादी का मुद्दा उठाया जाता है
जब भगत सिंह फांसी लटकाया जाता है
जब जब देश पर संकट आता है
देश को टुकड़ों में बांटा जाता है
जब मनु बाई मर्दानी बनकर
झांसी की रानी बनकर
दुश्मन को दूर तक खदेड़ती है
तब कविता बनती है, तब कविता बनती है

जब श्री राम वन में जा शबरी के बेरों को खाते हैं
जब केवट को गले लगा भीलों का मान बढाते हैं
जब हनुमान की छाती में राम नज़र हमें आते हैं
जब भरत राम की खडायूँ से राज-पाट चलाते हैं
कृष्ण सुदामा से मिलने नंगे पाँव दौड़ते आते हैं
मक्का मदीना गुरु नानक संग खुद घूमते जाते हैं
जब राम अयोध्या लौटते हैं, ओर दीवाली मनती है
तब कविता बनती है, तब कविता बनती है

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ग्रुरचरन मेह्ता 

2 Comments

  1. Muskaan 28/07/2013
  2. Gurcharan Mehta 'RAJAT' Gurcharan Mehta 28/07/2013

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