गुरू चरण-वंदना

अज्ञान-तिमिर,मन मेँ छाया,
जब आप मिले,आलोक हुआ।
सन्मार्ग मिला,सन्ताप मिटा,
दुर्बल अन्तस् का,क्षोभ हुआ।।

दूषित मानस मेँ ज्ञान-दीपिका,
आप प्रज्जवलित करते है।
करबद्ध आपकी,हे गुरूवर!
हम चरण-वन्दना करते है।।

दिक्-भ्रमित दिशायेँ कर देतीँ,
पुण्य-ध्येय ना मिल पाता।
हर भ्रम हमलोगोँ को छलता,
हर प्रश्न हमेँ,उलझा जाता।।

उलझी जीवन नौकाओँ को,
बन आप खेवैय्या,तरते है।
करबद्ध आपकी,हे गुरूवर!
हम चरण-वन्दना करते हैँ।।

ज्योतिर्मय,पंथ-प्रदर्शक,व्यापक,
आप ज्ञान के दर्पण है।
एक चिर अकिँचन का,गुरूवर!
यह गीत आपको अर्पण है।।

हर भूलोँ की,अपराधोँ की,
हम क्षमा-याचना करते है।
करबद्ध आपकी,हे गुरूवर!
हम चरण-वन्दना करते हैं।।
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शुभम् श्रीवास्तव ‘ओम’

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