फिकर एक पल नहीँ…..

फिक्र एक पल नहीँ कि-
बीतते आसार बेहतर हो,
तलबदारी कि-कल किस्मत
का फिर किरदार बेहतर
हो।।

इसारत मेँ
येही कोई,इज़ारदार कह
बैठा,
कि-सीरत छोड़िये सामान
का इश्तेहार बेहतर हो।।

शरारा कल वही फिर से
मसलहत आ गयी करने,
मेरी ये खामख्वाही किस
तरह दिलदार बेहतर हो?

मसलसल ग़र तज़ुर्बेदार
की बातेँ सुनोगे तो,
यकीँ मुझको नहीँ,कल
भी तेरे दरकार बेहतर
हो।।

कोई घर घर ठहर
कर,मरासिमी का ख़्वाब
बोता है,
मिरी ख्वाहिश कि पहले
खुद का ही परिवार
बेहतर हो।।

जमाने की असलियत खुद-ब-
खुद खुलती ही जायेगी,
बेफ़ैज तेग-ए-कलम मेँ ग़र
धार बेहतर हो।।

मेरे लब पे मुहब्बत के नये
नग़मेँ,फ़साने हो,
ये तेरा रूख अगर,पहले से
मेरे यार बेहतर हो।।

शुभम् श्रीवास्तव ‘ओम’

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