अधिकार

दीवार के पीछे से कैसे कुछ कहते उन हज़ारों से I
जो भी कहना था बस कह डाला हमने दीवारों से II

कहतें हैं कुछ और करते हैं कुछ और,
तभी तो पटती नहीं हमारी गद्दारों से I

आये हो बड़े धोखा देने वाले तुम हमें,
हम तो खुद लुट चुकें हैं अपने पहरेदारों से I

स्वभाव बदलने की बात न करना अब तुम कभी,
खुद को किया है ठंडा हमने आग उगलते अंगारों से I

समझ जातें हैं हर बात कम्बखत दुनिया वाले,
न करना कभी कोई बात अब इशारों से I

जब हमारी किस्मत में ही नहीं चाँद ओर तारे,
तो क्यूँ प्यार करें भला हम नजारों से I

यकीं एक बार नहीं कई बार किया था, कसम से,
पर हर बार, बार-बार चोट खाई हमने यारों से I

जो मिलें कभी तो कह देना , कसम खुदा की
रास्ता बदल लें, न गुजरें कभी हमारी मजारों से

बदल जायेंगे एक दिन जो अब तक नहीं बदले,
होगा जब सामना उनका किसी दिन खुद्दारों से I

गलती हमारी ही थी पर समझ न पाए हम “चरन”
समझते रहे कर्तव्य ओर वे बात करते रहे अधिकारों से II
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गुरचरन मेह्ता 

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