प्यार का मारा

प्यार का मारा
लगता है बादल भी प्यार का मारा है,
इसीलिए फिरता बनके आवारा है,
बेबस किया होगा विरहा ने शायद,
तभी धरती पे आंसुओं को उतारा है.(1)
यूँ तो फिज़ा में ख़ुशी में नज़ारा है,
हँसता हुआ जग ये सारा का सारा है,
मगर बेकरारी धरा की भी समझो,
जो बेखुदी में तनहा बेचारा है.(2)
पुरवा के झूलों ने बेला झुलाया है,
परदेसियों को घर वापस बुलाया है,
टोली परिंदों की भी आने लगी है,
ऐसे में साजन कहाँ पे हमारा है.(3)
फूलों के रंग में ये लम्हा नहाया है,
जैसे सदी रग-रग में समाया है,
ये इंतजार जान ही ले ना जाए,
कर दे खुदा झूठा ही एक इशारा है.(4)
सूरत को जो उनके हस्ती बनाया है,
दीदार को दर पे पलकें टिकाया है,
पर वो सदा को समझ ही ना पाएँ,
फिर भी बेदर्दी का हमको सहारा है.(5)
आवाज़ दे दे गया दिल ये हारा है,
जाने कहाँ ख्वाहिशों का किनारा है,
दिन-रात हम जोड़ खोजें उन्ही को,
जिनके लिए मरके जिंदा दोबारा है.(6)
हसरत जो मन का बना हमसाया है,
बाँह में उन्हें ले लूं अरमां सजाया है,
सदमें में आज वो पनाह खोजे फिरता,
जो बेरुखी उनके लब पे सराहा है.(7)
एहसास सिमटा जिगर में पुराना है,
छू लूँ उन्हें अपने ज़द में बिठाना है,
पलकों में वो सुर्ख चेहरा छुपा लूँ,
अब तक जिसे देख ज़िंदगी गुजारा है.(8)
रह-रह वही बस ख़याल में आया है,
जिसने मुझे ही मुझी से चुराया है,
बंद आँख में भी नज़र वही आए,
वो एक आड़े रब मैंने जिसको पुकारा है.(9)
:-सुहानता ‘शिकन’

 

 

 

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