चंद शेर

दीवार के पीछे से कैसे कुछ कहते उन हज़ारों से
जो भी कहना था बस कह डाला हमने दीवारों से

कहतें हैं कुछ और करते हैं कुछ और
तभी तो पटती नहीं हमारी गद्दारों से

आये हो बड़े धोखा देने वाले तुम हमें
हम तो खुद लुट चुकें हैं अपने पहरेदारों से

स्वभाव बदलने की बात न करना अब तुम कभी
खुद को किया है ठंडा हमने आग उगलते अंगारों से

समझ जातें हैं हर बात कम्बखत दुनिया वाले
न करना कभी कोई बात अब इशारों से

जब हमारी किस्मत में ही नहीं चाँद ओर तारे
तो क्यूँ प्यार करें भला हम नजारों से

यकीं एक बार नहीं कई बार किया था, कसम से
पर हर बार, बार-बार चोट खाई हमने यारों से

जो मिलें कभी तो कह देना , कसम खुदा की
रास्ता बदल लें, न गुजरें कभी हमारी मजारों से

बदल जायेंगे एक दिन जो अब तक नहीं बदले
होगा जब सामना उनका किसी दिन खुद्दारों से

गलती हमारी ही थी पर समझ न पाए हम “चरन”
समझते रहे कर्तव्य ओर वे बात करते रहे अधिकारों से

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गुरचरन मेह्ता

 

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  1. Muskaan 16/07/2013

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