करना चाहते हैं

जो चाहते हैं हमारी जान लेना आज यहाँ
हम उन्ही पर अपनी जां निसार – करना चाहते हैं
और दुश्मन जो समझतें हैं हमें दिल से अपना
अपने दोस्तों में हम उन्हें शुमार – करना चाहते हैं

ऐसा तो नहीं , की न हो कोई गल्ती हमने कभी
हम भी अपनी गलतियों का इज़हार – करना चाहते हैं

कहो तो छोड़ दें हम गम की दवा लेना उनसे
सुना है वे अब हमें बीमार – करना चाहते हैं

मर गया जो मैं तो मेरी आँखें बंद न करना
कि हम वहां पर भी उनका इंतज़ार – करना चाहते हैं

तेरे इश्क में हुए हम दीवाने , दुनिया से बेगाने
गर खता है यह तो हम, बार बार – करना चाहते हैं

वो हैं कि कुछ कहते भी नहीं, और सहते भी नही
हालात ठीक नहीं लगता है वे वार – करना चाहते हैं

जो लिया उसे रख लो, जो दिया उसे वापस ले लो
अब उम्र का ये आख़िरी पड़ाव हम पार – करना चाहते हैं

डरे-डरे, अस्त-व्यस्त, तितर-बितर हो रहे हैं सब यहाँ
कुछ इंसान शायद इंसानों का ही शिकार – करना चाहते हैं

काम,क्रोध,मद,मोह,माया सभी से प्यार है मुझे
बस इसी प्यार का तो हम बहिष्कार – करना चाहते हैं

सामना हुआ मौत से जीवन में कई बार , पर जीते रहे
पर जिन्दगी से हम अब भी साक्षत्कार – करना चाहते हैं

नफे और नुक्सान की बातें बहुत दूर हैं अब
दिमाग से नहीं अब दिल से हम व्यापार – करना चाहते हैं

आंधियां हमें उजाड़ने के लिए उतावली हैं “चरन”
ओर हम हैं कि बागों में फिर से बहार – करना चाहते हैं.

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गुरचरन मेह्ता 

One Response

  1. Muskaan 14/07/2013

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