हम क्या जानें

उनकी तरह यूँ बातें बनाना – हम क्या जानें
गल्ती जो हुई तो आँख मिलाना – हम क्या जानें
ये प्यार मोहब्बत दिल का फ़साना – हम क्या जानें
हकीकत तो यह है कि दिल का लगाना – हम क्या जानें

देता रहा मैं नसीहत, होती रही फजीहत
अब मैंने माना, किसी को समझाना – हम क्या जानें

आसमां की ये हस्ती, हवाओं की मस्ती
हम तो जमीं हैं , तो धुल उड़ाना – हम क्या जानें

पर्वतों का शिखर, रहा है बिखर
हमारी क्या हद, यूँ खुद पे इतराना – हम क्या जानें

उनकी वो बाहें, सिसकती निगाहें
नशा जब हुआ है तो होश में आना – हम क्या जानें

बिन चादर ही हमने सिकुड़ कर है रातें बिताई
फिर जितनी चादर उतने ही पैर फैलाना – हम क्या जानें

हाथों के कंगन, जन्मो के बंधन टूटते रहेंगे
फिर भरोसा जताना, यूँ वादा निभाना – हम क्या जानें

उम्मीद कि किरण नहीं बाकी, अब साकी
फिर टूटे दिलों की आस बंधाना – हम क्या जानें

मैं मुर्ख नादाँ , पागल, दीवाना हूँ अन्जाना
ये कुटिल मुस्कान, बहाने बनाना – हम क्या जानें

कह डाला आखिर जो मन में था, चलो अच्छा है
मौक़ा पाकर निशाना लगाना, यूँ तीर चलाना – हम क्या जानें

समंदर की सतह की तरह हम सबसे नीचे, हैं पीछे पीछे
लहरों के तरह डगमगाना , हिलोरें खाना – हम क्या जानें

प्यार के दो बोल जिससे सुने, उसे अपना माना “चरन ”
अब कैसे हैं लोग और कैसा ज़माना – हम क्या जानें

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गुरचरन मेह्ता

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  1. Muskaan 09/07/2013

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