बीमारी कवि- विनय भारत

जब से देखा है उसके प्रभाव को
दिन रात आहें भरता हूँ
इसका क्या है इलाज
दिन रात करवटें बदलता हूँ
कैसी है वो दिलजली
जिसके कारण मची है
दिल में खलबली
बच के रहना इससे यारों
ये है करारी जान बडी
ले लेगी जान अपने प्यार में
बडी बुरी ये करमजली
क्यूँकि
चली चली फिर चली चली
चली स्वाइन फ्लू की हवा चली
चक्कर में पड मरीज इसके
ढूँढे डाक्टर गली गली
चली चली फिर.

हास्य कवि- विनय भारत

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