इन्कलाब की भाषा बोलूँगा

मैं तो सच के साथ सदा हूँ – सब का पासा खोलूंगा
मैं तो सैनिक कलम का हूँ – इन्कलाब की भाषा बोलूँगा

दुशासन की भरमार यहाँ – कुशासन की सरकार यहाँ
अपनों का तिरस्कार यहाँ – जनता है लाचार यहाँ

जो कुर्सी पर बैठे, योग – उनको हम सिखलाएंगे
बहुमत में मत का प्रयोग – उनको हम दिखलायेंगे

घोटालों के राजाओं को – जबरदस्ती हमें समझाना होगा
ऊँघ रहें हैं देश भूल जो – नींद से उन्हें जगाना होगा

इतने चक्कर- हैं घनचक्कर – सबको पलड़े में तोलूँगा
मैं तो सैनिक कलम का हूँ – इन्कलाब की भाषा बोलूँगा

द्रौपदी बना कर रखा है – जनता को चीर हरण हेतू
वोट मांग आगे बढ़ जाते – जनता को बना कर ये सेतू

महसूस जरा करके देखो – मानवता पिसती खंडहर में
माझी इनको पार लगाता – हम फंसते बीच भंवर में

श्री राम की धरती को तुमने तो – लंका यहाँ बना डाला
चोर बाजारी और भुखमरी का – डंका यहाँ बजा डाला

चीत्कार सुनो सब की यहाँ – अकेले में मैं रो लूंगा
मैं तो सैनिक कलम का हूँ – इन्कलाब की भाषा बोलूँगा

देश बचाना है सत्ता सौंपो – किसी लोह पुरुष के हाथो में
अब ना बात बनेगी भैया – देखो बातों बातों में

कुछ नहीं तो राज – कुछ दिन के लिए हमें तुम दे देना
शत्रु को मार भगायेंगे – हमारा काम नहीं है शै देना

गंदगी ना साफ़ करें तो – दुर्गन्ध हमें तुम कह देना
गद्दारों को माफ़ करें तो – जयचंद हमें तुम कह देना

हिन्दुतान है सर्वोपरि – देश प्रेम की भावना घोलूंगा
मैं तो सैनिक कलम का हूँ – इन्कलाब की भाषा बोलूँगा

देश-द्रोहियों के संग बैठे – उनका सदा सम्मान किया
हँसे शहीदों की चिता पर – उनका सदा अपमान किया

जलियांवाला याद करो तो – खून खोलता जाता है
और देश की हालत देख कसम से – मन डोलता जाता है

आजादी के झूठे दीवाने – कुर्सी के लिए क्या-क्या कह गए
चन्द्र, पटेल और भगत सिंग – फूलों के लिए बस रह गए

चोट जिगर पर अगर लगेगी – तो क्या ? आराम से मैं भी सो लूंगा
मैं तो सैनिक कलम का हूँ – इन्कलाब की भाषा बोलूँगा

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गुरचरन मेह्ता 

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