डर लगता है

छुना चाहता हूँ उन्हें मैं करीब से जरा
मगर महकते गुलाब से होटों से – डर लगता है

बदलती रहती हैं तस्वीरें यहाँ वक़्त-बेवक़्त
चढ़े हैं चेहरों पर जो, उन मुखोटों से – डर लगता है

और मांगे जाते हैं जो हर बार मज़हब के नाम पर
हुकूमत पलटने वाले उन वोटों से – डर लगता है

के शरीर के घाव तो भर जाते हैं समय के साथ साथ
पर दिल पे जो लगती हैं गहरी उन चोटों से – डर लगता है

हाँ कमाना चाहता हूँ मैं भी, पर जितनी जरुरत है उतना ही
के मुझे तो जरुरत से ज्यादा नोटों से – डर लगता है

सिक्को को पहचनाने की काबलियत है मुझमें मगर
चल जाते हैं जो खोटे सिक्के, उन खोटों से – डर लगता है

आदर के साथ साथ डरते भी थे हम अपने बड़ों से
बदलें हैं दिन कुछ इस तरह कि छोटों से – डर लगता है

न रखो मन में जो भी दिल में है कह डालो “चरन”
गुबार दिल के जब फटते हैं उन विस्फोटों से – डर लगता है

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गुरचरन मेह्ता 

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  1. Muskaan 09/07/2013

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