कांच के महल ही महफूज हैं

बस कांच के महल ही महफूज हैं यहां

हर हाथ में पत्थर है अजीब  बात है ।

ओठों  पै बुलबुलों के हैं प्यार के तराने

पर आंख मे जहर है अजीब बात है ।

हर तरफ फैली हुई है एक अजीब सी बू

सिर्फ मुर्दों का शहर है अजीब बात है ।

प्यार की कीमत यहां तो देनी पड्ती है

शरीफ जादों का घर है अजीब बात है ।

करते हैं कत्ल भी जो शौक की खातिर

उन्हें आवाम का डर है अजीब बात है ।

जो भी सत्ता पा गया वो ही सिकन्दर बन गया

भूख उसकी पर अमर है अजीब बात है ।

मुजरिमों पर आजकल हर कोई है नर्म सा

बेबसॉ पर ही कहर है अजीब बात है ।

दास अपने साथ ही सब कुछ यहां मिट जायेगा

जिन्दगी उल्टा सफर है अजीब बात है ।

 

शिवचरण दास

2 Comments

  1. Gurcharan Mehta 'RAJAT' गुरचरन मेह्ता 24/06/2013
  2. Muskaan 03/07/2013

Leave a Reply