मोरे कान्हा ले चलो मोहे पार

मोरे कान्हा ले चलो मोहे पार,
मै हूँ कब से खड़ा रे तोरे द्वार ।।

माया भ्रम की मोरी गगरिया,
मारो कान्हा तान कंकरिया।
अंग अंग मोरा भीगे ऐसे,
प्रेम की बरखा बरसे जैसे।

संग भीगे सकल संसार,
मै हूँ कब से खड़ा रे तोरे द्वार।।१।।

प्रेम नीर से भरी ये काया,
हमने इसका मरम न पाया ।।
कांकर से जब भ्रम टूटा तो,
ज्ञान प्रेम भीतर ही पाया ।।

इस जीवन के तुम ही अधार,
मै हूँ कब से खड़ा रे तोरे द्वार।।२।।

Deepak Srivastava

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  1. Vishu 29/08/2013

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