दो वक़्त की रोटी के लिए

दो वक़्त की रोटी के लिए कोई बदनसीब रोता है |
तकदीर की खेती मे कोई किस्मत के बीज बोता है |
कोई बदकिस्मत मरकर भी खुद के कफन को रोता है |
मगर होता वही है जो मुकद्दर में लिखा होता है |

4 Comments

  1. manoj charan Manoj Charan 11/07/2013
  2. SUHANATA SHIKAN SUHANATA SHIKAN 16/07/2013

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