प्रियतम तो से कैसे कहूँ

प्रियतम तो से कैसे कहूँ
कितना है प्रेम
न कुछ सूझ रहा जब से गए परदेस|
रतिया जगती
दिनभर राह तकती हूँ
कब लौटोगे घर देस |

मुद्दत बाद खत लिखे हो
और मुझसे शिकवा करते हो
जुदाई अब सहने को न जाए
हर पल तेरी याद सताए
हाल-ए-दिल कर रही हूँ अर्जो-पेश
“सुरालय की सेज पर सुरांगना रूपी सुरा
सुरमणीक पैमाने में सोभित
प्रियतम सुराप के सुमिरन में बन सोगिनी
समझ सरिह्न साईयाँ कर रही सलांप-

मदहोशी का समां
वक्त वेला लगता मदमत दीवानों का संसार|

शाम होने को आवे
हर ओर मस्ती सी छा जावे
क्यों रहते थे इतनी दूर
कभी न ये सोचा चले आते मयखाने हजूर|

न सताया संशय ने !
कोई गैर ना छू ले उसे
डाले मर्यादा उसकी भंग
आज प्रियतम न उसके, है पास |

वक्त था जो जिरह या विरह हम में हो
वक्त आजकल जन्मों की जुदाई है”|……………..२

तो से कैसे कहूँ
कितना है प्रेम!
बन पपीहा साजन
नयना है तरसे
जब से गए परदेस,
अब की न उत्सव मनाऊं
न श्रंगार रचाऊं
लौटोगे न घर देस |

One Response

  1. Madan Mohan saxena 24/06/2013

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