क्यूंकि मैं मन का सच्चा हूँ

क्यूंकि मैं मन का सच्चा हूँ
क्यूंकि मैं मन का सच्चा हूँ
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तुम शोर कहो तुम बोर कहो
चाहो तो मुझको चोर कहो
अरे काला बादल बोलो तुम
चाहो तो घटा घनघोर कहो
अंधियारा जग में है फैला
चाहो तो मुझको भोर कहो
गरीब के मुह तक ना पहुंचा
रोटी का मुझको कोर कहो
जो मन अभी भी भरा नहीं
कुछ ओर कहो- कुछ ओर कहो
कलम मेरी कभी झूठ ना बोले
इस मामले मैं बच्चा हूँ
मैं तो सच ही लिखूंगा
क्यूंकि मैं मन का सच्चा हूँ
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सीधा कहो सादा कहो
चाहे मुझको आधा कहो
इस बेवकूफ को किसने
यहाँ पर है लादा कहो
जवान कहो अधेड़ कहो
चाहे बबुल का पेड़ कहो
चाहे रास्ते का मानो काँटा
चाहे आकर मारो चांटा
प्राचीन कहो नवीन कहो
चाहे मुझको तुम दीन कहो
पर धनी हूँ मै शब्दों का
धन का बेशक मैं कच्चा हूँ
मैं तो सच ही लिखूंगा
क्यूंकि मैं मन का सच्चा हूँ
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नौकर कहो चाकर कहो
गाली भी तुम गाकर कहो
जिन बैंकों में काला धन है
उन बैंकों का लॉकर कहो
झूठ के खिलाफ लिखता हूँ
मैं सच से पैसे खाकर कहो
कभी तो फूटो मुंह से अपने
मुद्दों को उठाकर कहो
फुसफुसा कर  मत बोलो
सच को सदा सुनाकर कहो
जैसा दिखता वैसा लिखता
सब जानते हैं मैं सच्चा हूँ
मैं तो सच ही लिखूंगा
क्यूंकि मैं मन का सच्चा हूँ
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तुम वार कहो बेकार कहो
चाहो तो रस की धार कहो
बात भेदती अन्दर तक तो
शौक से तुम तलवार कहो
तुम गर्व कहो अभिमान कहो
तुम मान कहो सम्मान कहो
तुम दास कहो हुजुर कहो
पर कुछ ना कुछ जरुर कहो
सफ़ेद कहो काला कहो
नेताओं का घोटाला कहो
सुन-सुन कर ये घोटाले
खा जाता मैं भी गच्चा हूँ
मैं तो सच ही लिखूंगा
क्यूंकि मैं मन का सच्चा हूँ
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तुम स्वर्ग कहो पाताल कहो
चाहे तबले की ताल कहो
जो कहता हूँ वो हकीकत है
चाहे शब्दों का जाल कहो
नित नए-नए बालू लालू हैं
तुम बाल की इसको खाल कहो
बेशक दाल को काला मानो
चाहो तो काली दाल कहो
कलम उठ गई सच की खातिर
तो गद्दारों का काल कहो
तुम चाहे मुझको बुरा कहो
चाहो तो मानो अच्छा हूँ
मैं तो सच ही लिखूंगा
क्यूंकि मैं मन का सच्चा हूँ
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मायुसी कहो मुस्कान कहो
चाहो तो सच की दूकान कहो
ये मुर्ख , बात कैसी बोले
चाहो तो इसको ज्ञान कहो
अपने मन के अन्दर झांको
तब अपने को इंसान कहो
और जब समझ आ जाए
शैतान को तुम शैतान कहो
जो बुत फिर भी बने बैठे
तो खुद को फिर शमशान कहो
हिम्मत करो सच कहने सुनने की
फिर कहो मै दिल का पक्का हूँ
मैं तो सच ही लिखूंगा
क्यूंकि मैं मन का सच्चा हूँ

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गुरचरन मेह्ता

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  1. Muskaan 20/06/2013

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