व्यर्थ की हलहल यहां पर आजकल

व्यर्थ की हलहल यहां पर आजकल

शहर हैं जंगल यहां पर आजकल ।

बस तरसती नेह को प्यासी नदी

ठहरा हुआ है जल यहां पर आजकल ।

आग का दरिया जो होता पार कर लेते

सिर्फ है दल दल यहां पर  आजकल ।

वादियों मे गूंजती हैं चीख की मायूसियां

मौत है पल पल यहां पर आजकल  ।

कोई हारे कोई जीते पर सजा होगी हमें

जुर्म का दंगल यहां पर आजकल ।

कातिलों कॉ दे दिया है अमन का तोहफा

दिल है हर घायल  यहां पर आजकल ।

शिवचरण दास

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