कुदरत का इन्साफ

इन्साफ है कुदरत का कितना निराला,
तु खो रहा है वो लम्हे जो न आयेन्गे कभी दुबारा,
कितना झूठा था तेरा प्यार अपनों के लिये,
बातें थी बडी बडी पर सब कुछ था खोखला !! इन्साफ है कुदरत का कितना निराला …

न देखा तुने अपने अन्श को चलते हुए पहली बार,
न घोल सकी मिश्री तेरे कानो मे उसकी प्यारी सी आवाज,
ये पल सुहाने तुने गन्वाये,
किन लव्जो मे उस खुदा के सामने तु करेगा प्रार्थना,
तेरे तो नसीब मे ही नही उन मस्त अट्खेलियो का दीदर करना !! इन्साफ है कुदरत का कितना निराला..

बीतेगा तेरा हर लम्हा खामोशियो की चादर ओडे,
सन्नाटा शमशान सा पसरेगा अब तेरे आंगन में,
अन्जाने भी गोद मे उठा लेते है जब चल के आता है वो नन्हे कदमो से,
तेरी किस्मत पे दया आती है न उठा पायेगा कभी अपने हाथों मे उसे !! इन्साफ है कुदरत का कितना निराला..

मद्मस्त आनन्द ले रही हु मे उन नन्ही बद्माशियो का,
उसकी अदाओ मे बीत जाता है दिन सारा,
कह्ते है जिन्दगी यु तो बहुत छोटी है,
पर इन्त्जार के लिये बहुत लम्बी है,
तेरा इन्तजार यु ही चलता रहे उमर भर !! इन्साफ है कुदरत का कितना निराला..

15 June 2013

2 Comments

  1. Gurcharan Mehta 'RAJAT' गुरचरन मेह्ता 15/06/2013
    • Muskaan 20/06/2013

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