रिश्ता-हास्य रचना

मेरे एक दोस्त के माँ-बाप ने उसे रिश्ते (लडकी देखने) के लिए देश से बाहर भेजा,
ओर वह कुछ दिन उस आधुनिक परिवार के साथ रहा.
वापसी के समय जब लडकी ने उसके विचारों को जानना चाहा,
तो जो कुछ उसने कहा वह एक छोटी सी हास्य रचना के माध्यम से प्रस्तुत है:-
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तेरी चाल को मैंने देखा है एड़ा नहीं तू ऐडी है
चलती है तू लचक-लचक तेरे पाँव में जैसे बेड़ी है
लन्दन की तरफ निगाहें लगता पैरिस को देखे
अरे भैगी लगती है तू, तेरी आँखें टेढ़ी-मेढ़ी हैं

तेरी मम्मी माशाल्लाह ईक उंगली पे सबको नचाती है
बैठे -बैठे बस एक जगह हुक्म पर हुक्म चलाती है
दो पैग मारती रोजाना और सिगरेट वो सुलगाती है
घर ऐसी-तैसी में जाए वो किटी-पार्टी जाती है

कहते थे कि तेरा बापू यहाँ कई-कई गाड़ियाँ बेचता है
पर देखा मैंने वो तो मैडम रिक्शा भर कर खेंचता है
कहते थे जोहरी है वो दिन रात वो हीरा ढूंढता है
पर ठेके के सामने वो तो रात को भुट्टा भूनता है

तेरी बहना भोली -भाली है पर अन्दर से वो भाला है
कल रात ही उसने मेरी इज्ज़त पर डाका डाला है
और बताऊँ क्या-क्या उसकी मैं राम कहानी
कहती थी कि दे दो मुझको तुम कोई प्रेम निशानी

तेरा भाई अंग्रेजी बोले और मुझको इंग्लिश भाये ना
मैं इंग्लिश में अनपढ़ हूँ ओर उसको हिंदी आये ना
मैं दाल-भात खाने वाला तेरा भाई खाता पीज़ा
मुझको नहीं बनना है मैडम अंग्रेजी का जीजा

तो माफ़ कर देना तुम मुझको मै वापस देश में जाऊंगा
और गाँव जाकर वहां से एक सांवली अप्सरा लाऊंगा
जो चूल्हे में रोटी बना कर रूठों को पल में मना दे
और ईटों वाले मेरे घर को सच में ही घर वो बना दे
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गुरचरन मेहता

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