आखिर कब तक

बेइमानों सा हम खाते हैं करते ईमान की बातें
प्यार में धोखा देते हैं दुश्मन का साथ निभाते
इसकी टोपी उसके सर- उसका सर इसकी टोपी
कल किसको मुर्ख बनाना है -ये सोच के कटती रातें

उसने हमें भेजा था बना कर इंसानों जैसा
जानवर हम बन गए काम शैतानो जैसा
गढ़े हुए मुर्दे उखाड़ते हैं हम रोजाना
बड़े हो गए हैं पर हैं काम नादानों जैसा

अरे! क्या मुंह हम दिखलायेंगे, खाता खुलेगा जब वंहा
किसने किसका क्या-क्या खाया याद नहीं है कब कंहा
इसको पीटा उसे घसीटा, मौका मिला है जब जंहा
मुल्ला पंडित झूठ बोलते- ठग हैं सभी के सब यंहा

बहुत हो गया अब तो कुछ आराम आ जाए
जिन्दगी की आख़िरी कब शाम आ जाए
आओ करें कुछ ऐसा कि सब खुश हो जाएँ
ये जिन्दगी के पल किसी के काम आ जाएँ

अपने देश की माटी से जो प्यार सदा करते हैं
शहीद वो हो जाते हैं सीमा पर जो मरत्ते हैं
बुजदिल नहीं कायर नहीं हम जैसे, वो जवां
हम घर में सोते-सोते, सपनो में भी डरते हैं.

बड़े बड़े संकल्प यहाँ पर उम्र बड़ी छोटी है
बाहर क्यूँ जाता बाबू, जब अपने घर रोटी है
मेहनत करने वाले स्वर गुन्जेंगे जब एक साथ
उनको देश से जाना होगा नीयत जिनकी खोटी है

हवा में लहराने लगी है देखो उसकी चुनिया
सपने कब पुरे होंगे है पूछती मेरी मुनिया
परियों के जैसे सपने पालें हैं उसने मन में
मोटी-मोटी आँखों में सपनों की छोटी दुनिया.
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गुरचरन मेहता

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