जीवन रंगमंच

जीवन के इस रंगमंच पर मै भी कभी रोया था |
कुछ भी पाने से पहले ही हमने सब कुछ खोया था |
सींच अश्रु जल से जमीन को बीज भाग्य का बोया था |
आशाओं के गीत पुराने मनमंदिर में संजोया था |

भर दे प्रेम सभी के मन में ऐसा सुन्दर गीत कहाँ ?
खो जाये वो अंतर्मन में ऐसी प्रीत की रीति कहाँ ?
द्रवित करे जो पाषाणों को बजता ऐसा संगीत कहाँ ?
खिले कंज हो मानस सर में ऐसा मेरा अतीत कहाँ ?

रोम रोम को करे प्रफुल्लित ऐसा मनोहर गान नहीं |
छू जाये जो ह्रदयंगम को वो वीणा की तान नहीं |
देख विहंगो के झुंडो को मुख पर आती मुस्कान नहीं |
स्पंदित कर दे जो ह्रदयो को ऐसा मेरा सम्मान नहीं |

प्रज्जलित करे जो प्रेम दीप को ऐसी अग्नि नहीं मिलती|
खिल जाये सरसिज मानस सर में ऐसी धूप नहीं खिलती|
रोये सर सरोज के दुःख से ऐसी प्रीति नहीं पलती |
बुझे नहीं जो अश्रु बिंदु से ऐसी अग्नि नहीं जलती |

उर सुलगाकर दृग बरसाकर प्रेम पालते वो है कौन ?
सब कुछ सहकर कुछ ना कहकर खुद को रुलाते वो है कौन ?
चातक के सूखे कंठो में जल बरसाते वो है कौन ?
खुले हुए नयनो में भी जो स्वप्न दिखाते वो है कौन ?

लाख पतंगे जले दीप से हुई दीप को व्यथा नहीं |
राम राम रट तोते मर गए बनी किसी की कथा नहीं |
प्रीत ने कितने मीत रुलाए प्रीत को इसका पता नहीं |
जल जाये चिंता इस जीवन की जलती ऐसी चिता नहीं |

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
9582510029

2 Comments

  1. manoj charan Manoj Charan 11/07/2013

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