बिटिया या बेटा

अक्सर बाबा कहते मुझसे
बिटिया नहीं मेरा बेटा है तू
और ये सोच के आँखें भर जाती मेरी
बाबा ऐसा कहते हैं क्यूँ

इसी सोच में बैठी थी एक दिन
बाबा क्यूँ मुझको कहते हैं बेटा
सीधा सा सवाल था जिसे खुद ही
उलझनों की तारों में था मैंने लपेटा

बाबा दुनिया भर से कहते फिरते
अपनी बिटिया पर मुझको नाज है
मुझको बस इतना समझाते
तू मेरे घर की लाज है

बाबा की आँखें पूरी नम हैं
जाने क्यों सकुचाई सी आवाज है
किसी ने उनसे जब ये कहा
आखिर बेटे होते घर का ताज हैं

आँख खुली तो ध्यान हुआ
इस सपने में छुपा जो राज था
मेरी समझ में आया तब वो
जो मेरे सवालों का जवाब था

सर पर मेरे जब बाबा के
हाथों का सरताज था
आँखें मेरी तब भी नम थी
नई उल्लासों का हुआ नया आग्हाज था

– प्रीती श्रीवास्तव ‘पर्ल’

 

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