बिदाई अनमोल रतन कि

मेरी आँशु  सुख गई सारी
रो रो के अब आकाश हि बर्से
ठुम ठुम नाचती आगन मे थि तब
दुल्हन बनके निकली अब घर से
बेटी तो है बस एक अमानत
फिर भी बाबुल काहेको तरसे
हात हिलाता भाई बहन को
खडा है दुर बडी सबर से
जननी कि हालत कुछ ऐसी
 हसती बाहर रोती अन्दरसे
किया बिदाई अपनी नन्ही को
दुर हुए फिर अनमोल रतन से
हरि पौडेल 

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