पाने को आतुर रहतें हैं

पाने को आतुर रहतें हैं खोने को तैयार नहीं है
मुहँ मोड़ा जिम्मेदारी ने ,सुबिधाओं की जीत हो रही.

साझा करने को ना मिलता सब अपने गम में ग़मगीन हैं
स्वार्थ दिखा जिसमें भी यारों उससे केवल प्रीत हो रही ..

कहने का मतलब होता था ,अब ये बात पुरानी है
जैसा देखा बैसी बातें जग की अब ये रीत हो रही …

अब खेलों में है राजनीति और राजनीति ब्यापार हुई
मुश्किल अब है मालूम होना ,किस्से किसकी मीत हो रही

क्यों अनजानापन लगता है अब खुद के आज बसेरे में
संग साथ की हार हुई और तन्हाई की जीत हो रही

ग़ज़ल प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

4 Comments

  1. Bharti Das bharti das 05/06/2013
    • मदन मोहन सक्सेना madansbarc 06/06/2013
  2. SUHANATA SHIKAN SUHANATA SHIKAN 06/06/2013
    • मदन मोहन सक्सेना madansbarc 06/06/2013

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