दुखों को मुस्कान बनाकर

अपना एक मुकाम बनाकर
जीवन को मचान बनाकर
जिन्दगी को जी लो भरपूर
दुखों को मुस्कान बनाकर

बनते हैं जो हमदर्द आपके
कभी कभी एहसान दिखाकर
उन्हें निकालो मन से बाहर
पल दो पल मेहमान बनाकर

बच बच के रहना उनसे
जो बैठे हैं घात लगाकर
उनको तुम अपना लेना
जो डरें हैं तुमसे मात खाकर

जीवन को बना लो सुखी
खुद को नेक इंसान बनाकर
आओगे जब उस जहाँ में बाद हमारे
रखेंगे हम पकवान बनाकर

किसी का न मारना हक कभी
कत्था -चूना- पान लगाकर
करना न अहंकार कभी
खुद को किसी का भगवान् बनाकर

कृपा रहे माँ शारदे की सदा
लिखना न कभी दूकान बनाकर
जीवन का मतलब सीखते रहना
खुद को बस नादान बनाकर

अपनी रचना रखना महफूज़
माँ सरस्वती का मकान बनाकर
माँ वीणा-वादिनी ने भेजा तुम्हे
देखो कितना धनवान बनाकर

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गुरचरन मेह्ता 

One Response

  1. Muskaan 04/06/2013

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