प्रेम यज्ञ

लंपटो के राज में मेरी जिन्दगी का ताज झूठा |

कल्पना की बाग में केलो के कुछ मंडप बनाये |
पीत केशर लीप करके पुष्प के आसन बिछाये |
स्वस्तिवाचन गान कर पयसिंधू से घट भर के लाये |
पल्लवों के कोपलों से फिर कलश को हैं सजाये |
किन्तु मेरी व्यवस्था का बिंदु झूठा ,आनंद का पयसिंधू झूठा |

कुंकुमाक्त अक्षतों से एक अभिनव चौक डाली |
रक्त चन्दन पुष्प दुर्बा हल्दी से थाली सजाली|
न्यास स्तुति गान करके प्रेम की मूर्ती बिठाली|
षोडशो विधान कर शतवर्ति की थाली उठाली|
किन्तु मेरी आरती का अर्चना मनुहार झूठा,प्रेममूर्ति देवता से प्रेम का व्यवहार झूठा|

हल्दी कुंकुम कुशा अक्षत से कुण्ड की परिधी सजाई|
पंचोपचार विधान करके आम्र की समिधा मगाई|
अर्णिमंथन ध्यान करके कुण्ड में अग्नी जलाई |
बेलगिरी सर्वौषधि  केसर से सामग्री बनाई |
किन्तु मेरी आहुति के ग्रास का सम्मान झूठा,प्रेममूर्ति देवता के यज्ञ का विधान झूठा|

थक हार करके यज्ञ से तप त्याग का संसार भाया|
व्रत साधना उपवास करके स्वस्थ तन को भी सुखाया |
प्राणायाम के अनुष्ठान से ब्रह्म का सानिध्य पाया |
वेदना स्त्रोत सुनकर व्रह्म भी कुछ तिलमिलाया |

तेरे ज्ञान का संज्ञान झूठा,स्तुती का गान झूठा ,रागिनी का तान झूठा |
वासना का त्याग झूठा, प्रेम का अनुराग झूठा,भक्ति का प्रयाग झूठा  |
वेदना का नाद झूठा,प्रणय का प्रासाद झूठा,जग आशीर्वाद झूठा  |
तन में तेरे श्वास झूठा, अतीत का इतिहास झूठा,विश्व में तेरा वास झूठा |

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