“अंतर्द्वंद”

जाने किस दुविधा में हूँ मैं, क्या यह अंतर्द्वंद समाया।

उच्छवासें आती हैं प्रतिपल, मन में गहन विषाद समाया।

 

आकांक्षाओं की सरिता यह, आशा और निराशा दो तट।

सीमाओं में बंधता जीवन, लघुता का अहसास निरापद।

 

जीवन-दर्पण के अक्सों में, अपना ही साया पहचानूं?

सावन की मोहक बूंदों में, अंतस की पीड़ा को जानूं?

 

शायद यह अंतस की पीड़ा, फिर वसंत के फूल खिलाये।

लघुता की परिसीमित व्याख्या, ये व्यक्तित्व विराट बनाये।

 

आशा और निराशा अनहद, जीवन का एक चित्र बनायें।

सीमाओं में बंधी तूलिका, शायद उसमें रंग भर जाये।

 

–         हिमांशु

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