“सच्चा सपना”

शैतान कहूँ उसको, या कहूँ फ़रिश्ता है,

क़ाबिल है इबादत के, या बस एक रिश्ता है।

 

रिश्ता जो टूट गया, फिर बुना नहीं जाता।

साथी जो छूट गया, फिर चुना नहीं जाता।

 

हम चुनते हैं यादें, हम बुनते हैं सपने।

उसको तो जाना है, सपने रहते अपने।

 

सपने सचमुच अपने हैं, या हमने बांधे हैं?

अपना मतलब करने को, बस हमने साधे हैं।

 

कितने ख़ुदगर्ज़ हुए हम, सपनों पर भी पहरा है।

है अँधेरा सपनों में, ये गहरे से गहरा है।

 

अपने रंग कि फुलझड़ियाँ हम रोज़ जलाते रहते।

अपने असली सपनों को नक्काल बनाते रहते।

 

क्या ऐसा दिन आएगा, जब सपने असली होंगे?

आओ एक सपना देखें जिसमें न कोई रंग होंगे।

 

जिसमें कोई धूप न होगी, ना होगी कोई छाया।

हाँ उस दिन मैं बोलूँगा, अब सच्चा सपना आया।

 

 

–         हिमांशु

 

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