“अहसास”

मैं आँखें बंद करूं जब भी,

वो ख़्वाब याद आ जाता है।

जिस टुकड़े को बुनता था मैं,

पूरा जैसे हो जाता है।

 

तस्वीर बनायी थी मैंने,

आधी सी एक अधूरी सी।

लेकर उसको फिरता था मैं,

पूरा न मगर कर पाता था।

 

जिस दिन तुमको देखा मैंने,

फिर रंग भरे उस पन्ने पर।

पूरी तस्वीर कहूं क्या थी,

चेहरा तेरा बन जाता है।

 

चेहरा तो इसमें तेरा है,

तस्वीर लगे पर अपनी-सी।

उलझन में बैठा हूँ मैं अब,

बोलो ये कैसे सुलझेगी।

 

 

–         हिमांशु

 

2 Comments

  1. Muskaan 05/06/2013
    • Himanshu Srivastava Himanshu Srivastava 07/06/2013